Wednesday, March 14, 2012

अस्तित्व की खोज


कल गोधुलि में, किसी ने मेरे ,अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगाया
क्षण भर को वितृष्णा जाग उठी , अकिंचन मन भी अकुलाया

दुर्भेद्य अँधेरे में भी, मन दर्पण , प्रतिबिंबित करता मेरी छाया
लाख जतन कोटि परिश्रम , पर अस्तित्व बिम्ब नजर न आया

विस्फारित नेत्रों से नीलभ नभ में , ढूंढ़ता अपने स्फुटन को
मार्तंड की रश्मि से पूछा , टटोला फिर निशा के विघटन को

क्या उसके कलुषित ह्रदय  का , ये  भी कोई ताना बाना है?
या उसके  कुटिल व्यक्तित्व का ,  कोई पीत पक्ष  अनजाना है 

उठा तर्जनी किसी तरफ , चरित्र हनन, हो गया शोशा है
हम निज कुंठा जनित स्वरों से , अंतर्मन को दे रहे  धोखा है

हम खोज  रहे अस्तित्व अपना , जैसे कस्तूरी ढूंढे  मृग राज
बिखर नहीं सकता ,कालखंड में , जिसकी त्वरित गति है आज

Friday, March 2, 2012

वंचिता

संध्या ने नभ के सर में 
अपनी अरुणाई घोली 
दिनकर पर अभिनव रोली 
बिखरे भर भर झोली 

रंगीन करों में उसके 
देख  रंगभरी पिचकारी 
पश्चिम के पट में छिपने 
भागे  सहस्र करधारी

धूमिल प्रकाश  में लख यह 
नभ-रंगभूमि की लीला 
नत -नयना नलिनी का मुख
मुरझाया हो कर पीला

तब आ कर अलि -बालाएं 
निज मृदु गुंजन गानों में 
प्रिय सजनी सरोजनी को 
है समझाती  कानों में 

सखी ! सहज कुटिल इस रवि की 
यह लीला नित ही होती 
अब कठिन बना निज मृदु उर 
क्यों अवनत -बदना   रोती 

Friday, February 10, 2012

मधु -उत्सव

कमनीय  -लता जो चढ़ी जा रही, 
मन मुदित हो रहा तरुवर है 
अमृत रस अब बरस रहा, 
पुलकित हो रहा सरवर है 

चारू -चन्द्र की चितवन, 
चित्त को चंचल  कर देती  
धवल चादिनी राते, 
सागर में कोलाहल  भर देती

दिग दिगंत  आमोद भरा 
मकरंद हुई हिम कणिका
सागर उन्मत्त कलोल भरा 
फेनिल फन चमके मणि सा 

मधुमास पल्लवित धरती पर , 
पीताम्बर तन पर डाले
किसलय कुसुम सुगन्धित मदिर 
अनंग प्रफुल्लित डाले गलबाहें 

धरनी के राग  वितान तने
आकांक्षा-तृप्ति की संगति को 
अभिनव क्रीडांगन है सजा धजा 
कौतुक-चेतना देता काम-रति को 


Friday, January 13, 2012

शिखा वार्ष्णेय रचित "स्मृतियों में रूस" और मेरी विहंगम दृष्टि

किताबे पढने का शौक जो बचपन से लगा अभी तक निर्विघ्न और अनवरत जारी है. सामने पुस्तक देखकर मेरी आँखों में उसे पढने की ललक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है.. अपने बचपन के दिनों में मुझे हिंदी के कुछ मूर्धन्य  और देदीप्यमान साहित्यकारों को  सन्मुख देखने को  मिला.  मुझे कई साल बाद उनके बारे में  पता चला  क्योंकि उस उम्र में लेखक या साहित्यकार क्या होते है ,मुझे  नहीं पता था..   सूर.तुलसी की  भक्ति आन्दोलन काल से प्राम्भ होकर,  रीतिकालीन  बिहारी के काव्य का रसास्वादन और  आधुनिक हिंदी साहित्य की हर विधा की पुस्तक पढने का सौभाग्य मिला है .

विगत दिनों हमारे हिंदी ब्लॉग जगत की प्रतिभाशाली और  लोकप्रिय  लेखिका श्रीमती शिखा वार्ष्णेय जी द्वारा लिखित पुस्तक "स्मृतियों में रूस" पढने का सौभाग्य मिला .  इस  प्रस्तुति की समीक्षा लिखना तो मेरे वश की बात नहीं है पर हाँ एक पाठक की हैसियत से दो शब्द जरुर कहूँगा. लेखिका किसी परिचय की मोहताज तो नहीं है फिर भी रीति   तो निभानी  ही पड़ेगी . लेखिका का जन्म हिन्दुस्तान में हुआ और प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने  .मास्को विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर की पदवी . स्वर्ण पदक के साथ अर्जित की. टीवी और प्रिंट मीडिया में काम  करने के बाद सम्प्रति लन्दन में स्वतंत्र पत्रकार के रूप में कार्यरत है .

"स्मृति में रूस" यूँ   पुस्तक के नाम से ही अनुमान लगाया जा सकता है की इस  पुस्तक में लेखिका ने  अपने उच्च अध्ययन  के लिए पूर्व सोवियत संघ में अपने पंचवर्षीय  प्रवास के दौरान जिये गए क्षणों को  समेटा है. पुस्तक का  कवर पेज आकर्षक और नयनाभिराम है .जो पहले नजर में ही पढने के लिए न्योता देता है .

लेखिका का रूस पढने जाने की खबर सुनकर माँ की ममता और संतान से विछोह के  डर का सटीक चित्र उकेरा है .
"एक बार लड़की को विदेश भेजा तो फिर वही की होकर रह जाएगी "

                            किसी भी विद्यार्थी द्वारा अपने परिवार से दूर जाने की मनोस्थिति का चित्र भी देखिये .
"अब जब मेरा अचानक चयन हो गया था रूस जाने के लिए तो मै समझ नहीं पा रही थी की खुश होऊ या डरूं"

लेखिका ने उन सारी कठिनाइयों का वर्णन किया है जो की भाषा जनित है . रूस में आंग्ल भाषा का प्रचलित ना होना और लेखिका का  रूसी भाषा से अपरिचित होना , संवादहीनता के कारण तमाम दुश्वारियों का सामना करना पड़ा ..
मुझे परेशान देख वो लड़की ना जाने क्या पूछने लगी रूसी में और मै उसकी शक्ल देखकर बडबडाने लगी "रुस्की नियत ".

लेखिका  ने अपने   रूस प्रवास के सालों में वहा के  सामाजिक और आर्थिक ढांचे में परिवर्तन की सुगबुगाहट , रोजमर्रा की जरुरत की चीजे पाने की मशक्कत , वहाँ  बढती महगाई , मुद्रा स्फीति का बढ़ना और वहाँ की  मुद्रा रूबल का अवमूल्यन , जैसी घटनाओ  का रोचकता से वर्णन किया है .

"उस समय रूस में हर चीजों में राशनिंग थी . उन दिनों वहा पर चावल , नमक चीनी से लेकर सेनेटरी नेपकिन लेने के लिए घंटो तक लाइन में लगे रहना पड़ता था वो भी पता लग जाए की दुकान में समान आ गया हो "

रोचक अंदाज में  मास्को स्टेट विश्वविद्यालय में अपने प्रवेश के बारे में बताने के बाद ,अचानक एक गंभीर विषय पर लेखनी चली है .शीतकालीन  द्वि- ध्रुवी  विश्व में एक ध्रुव का केंद्र सोवियत संघ के  विघटन .के बाद की राजनैतिक हलचल , आर्थिक सुधारों की छटपटाहट, अपने देश से बेइंतहा प्यार करने वाले रूसियों का अचानक विदेश जाने की  मोह वृद्धि , विदेशी मुद्रा की कालाबाजारी , रोजगार का टोटा, इत्यादि विषयों पर गम्भीर चर्चा पढने को मिलता है .

इन विकट परिस्थितियों से जूझते एक रूसी दंपत्ति की भूख से बिलबिलाने की कारुणिक झलक पाठक के अन्तःस्थल को झकझोर जाता है
 "एक दिन रास्ते पर चलते हुए मैंने एक माँ और ४-६ साल की बच्ची को देखा . माँ ने एक केला ख़रीदा और आधा खाया फिर बच्ची को दिया की वाह भी खा ले .बच्ची ने खाया तो माँ ने उसके हाथ से चौथाई केला ले लिया की ये पापा के लिए है "



  पुस्तक में रूसी भाषा के मूर्धन्य लेखको जैसे गोर्की , टालस्टाय की चर्चा से लेकर रसियन भोज्य पदार्थो के बारे में विभिन्न परिप्रेक्ष्य में  रोचकता से परोसा गया है .रूस की स्थापत्य कला के विख्यात स्तम्भ क्रेमलिन से लेकर सेवेन सिस्टर्स के बारे में रोचक जानकारी . विभिन्न एतिहासिक स्थलों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी और वहा के समाज में प्रचलित कथाएं भी संग्रहित  है .

.ज्यादा विस्तार में ना जाते हुए इतना कह सकता हूँ की संस्मरण विधा की इस रोचक पुस्तक में लेखिका के खट्टे मीठे अनुभवों के साथ मै डूबता उतराता  रहा ..  साहित्यिक आडंबर ना ओढ़े हुए ये  पुस्तक आम पाठक के लिए लिखी गई है वही खास वर्ग को भी  पढने के लिए आकर्षित करेगी ,ऐसा मेरा दावा है.
और अंत में
संस्मरण  विधा को रोचकता से प्रस्तुत करने के लिए लेखिका को हार्दिक बधाई .एवं साधुवाद

पुस्तक -- स्मृतियों में रूस 
लेखिका - शिखा वार्ष्णेय 
प्रकाशक - डायमंड पब्लिकेशन 
मूल्य  -- 300 /रूपये

 . .
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Thursday, October 6, 2011

ओ दशकन्धर

आज फिर लगाया हमने, दशानन के पुतले में अग्नि 
नयन हुए हमारे पुलकित, सुनाई दी उच्च शंख ध्वनि 
खुश हुए, कि नहीं वो, अमर जैसे अम्बर और अवनि

उदभट विद्वता और  बाहुबल, छल कपट  और घमंड 
पुलस्त्य कुल में जन्म लेकर भी , जो बन गया  उदंड 
श्रुति, वेद, ज्ञाता, परम पंडित, और  शिव भक्त प्रचंड 


निज नाभि अमृत होकर भी, जो  अमरत्व न पा सका 
राम अनुज को नीति बता, भी  नीतिवान न कहला सका 
स्त्री-हरण अधर्म है, दशानन स्वयं को समझा न सका .


हर साल जलाया जाता, एक अक्षम्य अपराध  की खातिर 
रोज सीता हरण होता है, अगण्य दसकंधर से हम गए घिर 
मुखाग्नि उसको देता, बन मुख्य अतिथि, नव-रावण शातिर

कह रहा जलकर रावण, इस पुतले को जलाने से क्या पाया तुमने।
तुम्हारे समाज में जो हैं व्याप्त जिन्दा, उन्हें क्या जलाया तुमने? 
हर साल जलाते हो, इस बार भी बस वही रस्म निभाया तुमने।


--

Friday, September 16, 2011

मै लिख़ नहीं सकता

आज १७ सितम्बर है जो  दो महत्वपूर्ण घटनाओ का साक्षी है . पहला तो भगवान विश्वकर्मा को समर्पित दिवस और दूसरा मेरे ब्लॉग का अवतरण दिवस . हा हा . कुछ ज्यादा हो गया तो माफ़ कर दीजियेगा . अंतर्जाल से परिचय तो पुराना है लेकिन  हिंदी ब्लॉग्गिंग  से  मेरे एक भूतपूर्व मित्र ने   परिचय कराया. हिंदी ब्लॉग जगत में आते जाते (जो  शुरुआत  में केवल एक- दो ब्लॉग तक सीमित था) रहे और पढने की उत्कंठा बढती गई..महीनो तक एक पाठक की हैसियत से मै साहित्य रस लेता रहा . इस बीच अंतर्जाल पर कुछ स्वनामधन्य ब्लोग्गरों से मिलने का मौका मिला जिसमे आदरणीया  संगीता स्वरुप जी , शिखा वार्ष्णेय जी , रेखा श्रीवास्तव् जी , दिव्या जी . प्रमुख रही . आप लोगों  द्वारा बार बार मिले प्रोत्साहन  ने मुझे अपना ब्लॉग बनाने को प्रेरित किया .डरते डरते मैंने अपनी पहली पोस्ट लिखी. एक साल की इस यात्रा में कई खट्टे मीठे अनुभवों से भी गुजरने का मौका मिला . इस अनवरत यात्रा में श्रीयुत अनूप शुक्ल जी , श्रीयुत  मनोज कुमार जी जैसे मूर्धन्य ब्लोगरों का प्रोत्साहन हमेशा प्रेरणाप्रद होता है मेरी कलम के लिए.  ब्लॉग जगत का शुक्रिया जो मुझ अकिंचन की लिखी पंक्तियों को अपनी गुणी नजरों से परखता है अपने टिपण्णी के माध्यम से. ज्यादा ना लिखते हुए मै अपनी उन पक्तियों को आप सबके नजर करना चाहूँगा जो मेरे मनोभावों  की दर्पण है . . .आपका सबका प्यार और प्रोत्साहन अभिभूत करता है .

मै लिख नहीं सकता, क्योकि मेरे ज्ञान चक्षु बंद है.
हाँ मै प्रखर  नहीं  हूँ, नहीं मेरी वाणी में मकरंद है.

अभिव्यक्ति , खोजती है, चतुर शब्दों का संबल
सक्रिय मष्तिष्क  और  खुले दृग , प्रतिपल

दिवास्वप्न जैसा क्यों मुझे सब प्रतीत होता है.?
क्या हर लेखक का लिखने का अतीत होता है?

क्या मै संवेदनहीन हूँ, या मेरी  आंखे बंद है
या नहीं जानता मै , क्या नज़्म क्या छंद है.

वेदना  को शब्द देना, पुलकित  मन का इठलाना.
सर्व विदित है शब्द- शर , क्यू मै रहा अनजाना

मानस सागर में  है उठता ,जिन भावो का स्पंदन.
तिरोहित होकर वो शब्दों में, चमके जैसे कुंदन.



Wednesday, August 10, 2011

पुनर्मिलन

बरस रहे  घन   मेघ ,
चपला चमके उनके उर में
नव नील कुञ्ज झूम रहे,
दादुर चातक गाते सुर में


रिमझिम अविरल अजर फुहारे,
मन में लालसा गोपन भरती
,नव कोपल उग आये अगणित,
दग्ध ह्रदयको  अभिसिचित करती


फूलों का उत्सव घर अनंग  के, 
मादकता है बरस रही
मदिरारुण आँखों से उनकी,
आकांक्षा -तृप्ति है झलक रही


अनंत  यौवन- मधु झरता ,
मधु-राका है उर्ध्वाधर  गामी
पुलकित,आंखे बंद किये ,
रूपरस पीता बन अलि का अनुगामी


कोमल लतिका सी बाँहों का ,
सुरभि लहरी सा शीतल आलिंगन
मदविह्वल कर देता ,
 मृदुल अँगुलियों का स्पर्श -अभिनन्दन


 अनंग के कोमल  पुष्प शरों से ,
विध रहा अकिंचन सा  ये तन
चिर तृष्णा बेचैन हुई ,
मतवाली माया का  अद्भुत सृष्टि मिलन