संध्या ने नभ के सर में
अपनी अरुणाई घोली
दिनकर पर अभिनव रोली
बिखरे भर भर झोली
रंगीन करों में उसके
देख रंगभरी पिचकारी
पश्चिम के पट में छिपने
भागे सहस्र करधारी
धूमिल प्रकाश में लख यह
नभ-रंगभूमि की लीला
नत -नयना नलिनी का मुख
मुरझाया हो कर पीला
तब आ कर अलि -बालाएं
निज मृदु गुंजन गानों में
प्रिय सजनी सरोजनी को
है समझाती कानों में
सखी ! सहज कुटिल इस रवि की
यह लीला नित ही होती
अब कठिन बना निज मृदु उर
क्यों अवनत -बदना रोती
