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Friday, March 2, 2012

वंचिता

संध्या ने नभ के सर में 
अपनी अरुणाई घोली 
दिनकर पर अभिनव रोली 
बिखरे भर भर झोली 

रंगीन करों में उसके 
देख  रंगभरी पिचकारी 
पश्चिम के पट में छिपने 
भागे  सहस्र करधारी

धूमिल प्रकाश  में लख यह 
नभ-रंगभूमि की लीला 
नत -नयना नलिनी का मुख
मुरझाया हो कर पीला

तब आ कर अलि -बालाएं 
निज मृदु गुंजन गानों में 
प्रिय सजनी सरोजनी को 
है समझाती  कानों में 

सखी ! सहज कुटिल इस रवि की 
यह लीला नित ही होती 
अब कठिन बना निज मृदु उर 
क्यों अवनत -बदना   रोती