कल गोधुलि में, किसी ने मेरे ,अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगाया
क्षण भर को वितृष्णा जाग उठी , अकिंचन मन भी अकुलाया
दुर्भेद्य अँधेरे में भी, मन दर्पण , प्रतिबिंबित करता मेरी छाया
लाख जतन कोटि परिश्रम , पर अस्तित्व बिम्ब नजर न आया
विस्फारित नेत्रों से नीलभ नभ में , ढूंढ़ता अपने स्फुटन को
मार्तंड की रश्मि से पूछा , टटोला फिर निशा के विघटन को
क्या उसके कलुषित ह्रदय का , ये भी कोई ताना बाना है?
या उसके कुटिल व्यक्तित्व का , कोई पीत पक्ष अनजाना है
उठा तर्जनी किसी तरफ , चरित्र हनन, हो गया शोशा है
हम निज कुंठा जनित स्वरों से , अंतर्मन को दे रहे धोखा है
हम खोज रहे अस्तित्व अपना , जैसे कस्तूरी ढूंढे मृग राज
बिखर नहीं सकता ,कालखंड में , जिसकी त्वरित गति है आज
