Wednesday, April 11, 2012

नाच उठा मयूर

आजकल दिल्ली प्रवास चल रहा है , कल शाम को अचानक काले  बादल आए  और पुरे शहर पर छा गए  . शाम को ५ बजे ही घनघोर अँधेरा . जैसे रात्रि के ८ बजे हो . कुछ पंक्तिया जेहन में आई तो मुलाहिजा फरमाएं .


नभ के प्रदेश में जलधर
फैलाते अपना आसन
अधिकार जमा क्रम -क्रम से
दृढ करते अपना शासन

आच्छादित  धीरे धीरे
है हुआ गगन अब सारा
लघुतम प्रदेश भी घन के
जालों से रहा ना न्यारा

अपने अति प्रिय जलदो को
लख अतुल समुन्नति धारी
है  मुग्ध   मयूरी -मानस
लें   हर्ष   हिलोरे   भारी

अंकों  में अन्तर्हित  कर
निज चपल चित्त -चावों को
यह  दर्शाती  नर्तन  से
अति अभिनन्दन -भावों को

हो भाग उस संमृद्धि में
ऐसी  भी चाह नहीं है
देखे केवल वैभव उनके
 इसके सुख की थाह नहीं है

 
 


Monday, April 2, 2012

सुनो ! मत छेड़ो सुख तान

मधुर  सौख्य के विशद भवन में
छिपा हुआ  अवसान

निर्झर के स्वच्छंद गान में,
छिपी हुई वह साध

जिसे व्यक्त करते ही उसको,
लग जाता अपराध
इस से ही  वह अविकल प्रतिपल
गाता दुःख के गान !   सुनो मत छेड़ो सुख तान

महा सिन्धु के तुमुल नाद में,

है भीषण उन्माद
जिसकी लहरों के कम्पन में,
है अतीत की याद
तड़प तड़प इससे  रह जाते
 उसके कोमल प्रान!  सुनो मत छेड़ो सुख तान


कोकिल के गानों पर ,
बंधन के है पहरेदार
कूक कूक कर केवल बसंत में ,
रह जाती मन मार
अपने गीत -कोष से
जग को देती दुःख का दान ! सुनो मत छेड़ो सुख तान

हम पर भी बंधन का पहरा
रहता है दिन रात
अभी ना आया है जीवन का
सुखमय स्वर्ण प्रभात
इसीलिए अपने गीतों में
रहता दुःख का भान! सुनो मत छेड़ो सुख तान







Wednesday, March 21, 2012

शाश्वत प्यार .

जब निदाध से तापित होता 
 धरनी  का उर अपरम्पार 
उमड़ घुमड़ कजरारे वारिद 
सिंचन करते शिशिर फुहार 

जब तम पट में मुँह ढक राका
रोती गिरा अश्रु निहार 
सुभग सुधाकर उसे हँसाता 
ललित  कलाएं सभी प्रसार 

सरोजनी का मृदुल बदन जब 
नत होता सह चिंता भार
दिनकर कर -स्पर्श से उसमे 
करता अमित मोद संचार 

सरिताओं  के जीवन पर जब 
करता तपन कठोर प्रहार
व्योम मार्ग से जलधि भेजता 
उन तक निज उर की रसधार 

कठिन पवन के झोंको से जब 
होता विकल मधुप सुकुमार 
कमल-कली झट उसे बचाती 
आवृत कर निज अन्तर्द्वार

हृदयहीन होने पर भी है
कितना सहृदय व्यापार 
प्रकृति सुंदरी सत्य  बता दे 
किससे पाया इतना प्यार ?

Wednesday, March 14, 2012

अस्तित्व की खोज


कल गोधुलि में, किसी ने मेरे ,अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगाया
क्षण भर को वितृष्णा जाग उठी , अकिंचन मन भी अकुलाया

दुर्भेद्य अँधेरे में भी, मन दर्पण , प्रतिबिंबित करता मेरी छाया
लाख जतन कोटि परिश्रम , पर अस्तित्व बिम्ब नजर न आया

विस्फारित नेत्रों से नीलभ नभ में , ढूंढ़ता अपने स्फुटन को
मार्तंड की रश्मि से पूछा , टटोला फिर निशा के विघटन को

क्या उसके कलुषित ह्रदय  का , ये  भी कोई ताना बाना है?
या उसके  कुटिल व्यक्तित्व का ,  कोई पीत पक्ष  अनजाना है 

उठा तर्जनी किसी तरफ , चरित्र हनन, हो गया शोशा है
हम निज कुंठा जनित स्वरों से , अंतर्मन को दे रहे  धोखा है

हम खोज  रहे अस्तित्व अपना , जैसे कस्तूरी ढूंढे  मृग राज
बिखर नहीं सकता ,कालखंड में , जिसकी त्वरित गति है आज

Friday, March 2, 2012

वंचिता

संध्या ने नभ के सर में 
अपनी अरुणाई घोली 
दिनकर पर अभिनव रोली 
बिखरे भर भर झोली 

रंगीन करों में उसके 
देख  रंगभरी पिचकारी 
पश्चिम के पट में छिपने 
भागे  सहस्र करधारी

धूमिल प्रकाश  में लख यह 
नभ-रंगभूमि की लीला 
नत -नयना नलिनी का मुख
मुरझाया हो कर पीला

तब आ कर अलि -बालाएं 
निज मृदु गुंजन गानों में 
प्रिय सजनी सरोजनी को 
है समझाती  कानों में 

सखी ! सहज कुटिल इस रवि की 
यह लीला नित ही होती 
अब कठिन बना निज मृदु उर 
क्यों अवनत -बदना   रोती 

Friday, February 10, 2012

मधु -उत्सव

कमनीय  -लता जो चढ़ी जा रही, 
मन मुदित हो रहा तरुवर है 
अमृत रस अब बरस रहा, 
पुलकित हो रहा सरवर है 

चारू -चन्द्र की चितवन, 
चित्त को चंचल  कर देती  
धवल चादिनी राते, 
सागर में कोलाहल  भर देती

दिग दिगंत  आमोद भरा 
मकरंद हुई हिम कणिका
सागर उन्मत्त कलोल भरा 
फेनिल फन चमके मणि सा 

मधुमास पल्लवित धरती पर , 
पीताम्बर तन पर डाले
किसलय कुसुम सुगन्धित मदिर 
अनंग प्रफुल्लित डाले गलबाहें 

धरनी के राग  वितान तने
आकांक्षा-तृप्ति की संगति को 
अभिनव क्रीडांगन है सजा धजा 
कौतुक-चेतना देता काम-रति को 


Friday, January 13, 2012

शिखा वार्ष्णेय रचित "स्मृतियों में रूस" और मेरी विहंगम दृष्टि

किताबे पढने का शौक जो बचपन से लगा अभी तक निर्विघ्न और अनवरत जारी है. सामने पुस्तक देखकर मेरी आँखों में उसे पढने की ललक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है.. अपने बचपन के दिनों में मुझे हिंदी के कुछ मूर्धन्य  और देदीप्यमान साहित्यकारों को  सन्मुख देखने को  मिला.  मुझे कई साल बाद उनके बारे में  पता चला  क्योंकि उस उम्र में लेखक या साहित्यकार क्या होते है ,मुझे  नहीं पता था..   सूर.तुलसी की  भक्ति आन्दोलन काल से प्राम्भ होकर,  रीतिकालीन  बिहारी के काव्य का रसास्वादन और  आधुनिक हिंदी साहित्य की हर विधा की पुस्तक पढने का सौभाग्य मिला है .

विगत दिनों हमारे हिंदी ब्लॉग जगत की प्रतिभाशाली और  लोकप्रिय  लेखिका श्रीमती शिखा वार्ष्णेय जी द्वारा लिखित पुस्तक "स्मृतियों में रूस" पढने का सौभाग्य मिला .  इस  प्रस्तुति की समीक्षा लिखना तो मेरे वश की बात नहीं है पर हाँ एक पाठक की हैसियत से दो शब्द जरुर कहूँगा. लेखिका किसी परिचय की मोहताज तो नहीं है फिर भी रीति   तो निभानी  ही पड़ेगी . लेखिका का जन्म हिन्दुस्तान में हुआ और प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने  .मास्को विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर की पदवी . स्वर्ण पदक के साथ अर्जित की. टीवी और प्रिंट मीडिया में काम  करने के बाद सम्प्रति लन्दन में स्वतंत्र पत्रकार के रूप में कार्यरत है .

"स्मृति में रूस" यूँ   पुस्तक के नाम से ही अनुमान लगाया जा सकता है की इस  पुस्तक में लेखिका ने  अपने उच्च अध्ययन  के लिए पूर्व सोवियत संघ में अपने पंचवर्षीय  प्रवास के दौरान जिये गए क्षणों को  समेटा है. पुस्तक का  कवर पेज आकर्षक और नयनाभिराम है .जो पहले नजर में ही पढने के लिए न्योता देता है .

लेखिका का रूस पढने जाने की खबर सुनकर माँ की ममता और संतान से विछोह के  डर का सटीक चित्र उकेरा है .
"एक बार लड़की को विदेश भेजा तो फिर वही की होकर रह जाएगी "

                            किसी भी विद्यार्थी द्वारा अपने परिवार से दूर जाने की मनोस्थिति का चित्र भी देखिये .
"अब जब मेरा अचानक चयन हो गया था रूस जाने के लिए तो मै समझ नहीं पा रही थी की खुश होऊ या डरूं"

लेखिका ने उन सारी कठिनाइयों का वर्णन किया है जो की भाषा जनित है . रूस में आंग्ल भाषा का प्रचलित ना होना और लेखिका का  रूसी भाषा से अपरिचित होना , संवादहीनता के कारण तमाम दुश्वारियों का सामना करना पड़ा ..
मुझे परेशान देख वो लड़की ना जाने क्या पूछने लगी रूसी में और मै उसकी शक्ल देखकर बडबडाने लगी "रुस्की नियत ".

लेखिका  ने अपने   रूस प्रवास के सालों में वहा के  सामाजिक और आर्थिक ढांचे में परिवर्तन की सुगबुगाहट , रोजमर्रा की जरुरत की चीजे पाने की मशक्कत , वहाँ  बढती महगाई , मुद्रा स्फीति का बढ़ना और वहाँ की  मुद्रा रूबल का अवमूल्यन , जैसी घटनाओ  का रोचकता से वर्णन किया है .

"उस समय रूस में हर चीजों में राशनिंग थी . उन दिनों वहा पर चावल , नमक चीनी से लेकर सेनेटरी नेपकिन लेने के लिए घंटो तक लाइन में लगे रहना पड़ता था वो भी पता लग जाए की दुकान में समान आ गया हो "

रोचक अंदाज में  मास्को स्टेट विश्वविद्यालय में अपने प्रवेश के बारे में बताने के बाद ,अचानक एक गंभीर विषय पर लेखनी चली है .शीतकालीन  द्वि- ध्रुवी  विश्व में एक ध्रुव का केंद्र सोवियत संघ के  विघटन .के बाद की राजनैतिक हलचल , आर्थिक सुधारों की छटपटाहट, अपने देश से बेइंतहा प्यार करने वाले रूसियों का अचानक विदेश जाने की  मोह वृद्धि , विदेशी मुद्रा की कालाबाजारी , रोजगार का टोटा, इत्यादि विषयों पर गम्भीर चर्चा पढने को मिलता है .

इन विकट परिस्थितियों से जूझते एक रूसी दंपत्ति की भूख से बिलबिलाने की कारुणिक झलक पाठक के अन्तःस्थल को झकझोर जाता है
 "एक दिन रास्ते पर चलते हुए मैंने एक माँ और ४-६ साल की बच्ची को देखा . माँ ने एक केला ख़रीदा और आधा खाया फिर बच्ची को दिया की वाह भी खा ले .बच्ची ने खाया तो माँ ने उसके हाथ से चौथाई केला ले लिया की ये पापा के लिए है "



  पुस्तक में रूसी भाषा के मूर्धन्य लेखको जैसे गोर्की , टालस्टाय की चर्चा से लेकर रसियन भोज्य पदार्थो के बारे में विभिन्न परिप्रेक्ष्य में  रोचकता से परोसा गया है .रूस की स्थापत्य कला के विख्यात स्तम्भ क्रेमलिन से लेकर सेवेन सिस्टर्स के बारे में रोचक जानकारी . विभिन्न एतिहासिक स्थलों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी और वहा के समाज में प्रचलित कथाएं भी संग्रहित  है .

.ज्यादा विस्तार में ना जाते हुए इतना कह सकता हूँ की संस्मरण विधा की इस रोचक पुस्तक में लेखिका के खट्टे मीठे अनुभवों के साथ मै डूबता उतराता  रहा ..  साहित्यिक आडंबर ना ओढ़े हुए ये  पुस्तक आम पाठक के लिए लिखी गई है वही खास वर्ग को भी  पढने के लिए आकर्षित करेगी ,ऐसा मेरा दावा है.
और अंत में
संस्मरण  विधा को रोचकता से प्रस्तुत करने के लिए लेखिका को हार्दिक बधाई .एवं साधुवाद

पुस्तक -- स्मृतियों में रूस 
लेखिका - शिखा वार्ष्णेय 
प्रकाशक - डायमंड पब्लिकेशन 
मूल्य  -- 300 /रूपये

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