Sunday, September 19, 2010

कमनीय स्वप्न

कौन थी वो प्रेममयी , जो हवा के झोके     संग आई
जिसकी खुशबू फ़ैल रही है , जैसे नव  अमराई
क्षीण कटि, बसंत वसना, चंचला सी अंगड़ाई 


 खुली हुई वो स्निग्ध बाहें , दे रही थी  आमंत्रण
नवयौवन उच्छश्रीन्खल. लहराता आंचल प्रतिक्षण
लावण्य पाश से बंधा मै, क्यों छोड़ रहा था हठ प्रण

मृगनयनी,तन्वांगी , तरुणी, उन्नत पीन उरोज
अविचल चित्त , तिर्यक दृग ,अधर   पंखुड़ी  सरोज
क्यों विकल हो रहा था ह्रदय , ना सुनने  को कोई अवरोध


कामप्रिया को करती लज्जित , देख अधीर होता ऋतुराज
देखकर  दृग  कोर से मै , क्यों बजने लगे थे दिल के साज
उसके , ललाट से  कुंचित केश हटाये,झुके नयन भर लाज


नहीं मनु मै, ना वो श्रद्धा, पुलकित नयन गए थे मिल
आलिंगन बद्ध होते ही उनकी , मुखार्व्रिंद गए थे खिल
हम खो गए थे अपने अतीत में , आयी समीप पुनः मंजिल .

15 comments:

  1. ओह यह सब स्वप्न में था ....पढते पढते आँखों के सामने ऐसी कमनीय नारी कि तस्वीर उभर कर आ गयी ...कितना सुन्दर वर्णन किया है ...अद्भुत सौंदर्य वर्णन ...

    उत्कृष्ट रचना :):)

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  2. .

    खुश हूँ ये जानकार की मंजिल आपके करीब है एक बार पुनः।
    सुन्दर रचना
    आभार।

    .

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  3. मैं क्या कहूँ मुझे समझ नहीं आ रहा.हिंदी इतने सुन्दर शब्द और एक साथ...कितना हसीं सपना है .और कितनी सुन्दर प्रस्तुति.
    सचमुच उत्कृष्ट रचना.

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  4. आदरणीय संगीता जी .
    आपके इस उत्साहवर्धन के लिए आभारी हूँ.

    दिव्या जी
    सपने तो सपने होते है .

    शिखा जी
    हम तो अभी प्रशिक्षु है , धन्यवाद उत्साहवर्धन के लिए.

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  5. सिर्फ साहित्य पढ़ा ही नहीं बल्कि गढ़ा भी है, लग रहा है की उच्चकोटि के कवि हो, श्रृंगार रस की छटा बिखेर कर साबित किया है की हम आ गए हैं. अब इससे आगे क्या कहूं?

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  6. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 22 - 9 - 2010 मंगलवार को ली गयी है ...
    कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  7. इतना अच्छा लिखा है आपने की मैं कुछ कह ही नही पा रही हूँ
    बहुत अच्छे शुभकामनाये

    दीप्ति शर्मा

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  8. कामप्रिया को करती लज्जित , देख अधीर होता ऋतुराज
    देखकर दृग कोर से मै , क्यों बजने लगे थे दिल के साज ..

    उन्मुक्त प्रेम और श्रांगार से रची लाजवाब प्रस्तुति है .....

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  9. कल गल्ती से तारीख गलत दे दी गयी ..कृपया क्षमा करें ...साप्ताहिक काव्य मंच पर आज आपकी रचना है


    http://charchamanch.blogspot.com/2010/09/17-284.html

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  10. Lagta hai rati ka saundarya varnan kar rahe hain aap... behad sundar rachna...

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  11. अरे वाह
    छायावाद फिर वापस आ रहा है
    सौब्दयता ही संसार को बचा सकती है.
    आनंद आ गया.

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  12. इस रचना को जितनी बार पढूं नया लगता है , स्मृति-पटल पर अंकित हो गया है. आभार

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  13. आशीष जी, श्रृंगार रस का इतना कोमल और पवित्र वर्णन ही होना चाहिये, ऐसा नहीं की मन वितृष्णा से भर जाये. अद्भुत कविता है. एक और कामायनी..

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  14. रेखा दी ने सच कहा...:)
    श्रींगार रस की छटा बिखर बिखर कर आ रही है..!!

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