Wednesday, September 22, 2010

मन का दीप

यू करो मन का दीप  प्रज्ज्लावित  ,  निर्मम तम , क्लांत ना कर पाए
आशा के तुम दीप जलाओ , दीखे प्रदीप , मन अशांत ना कर पाए

प्राण की बाती, स्वावलंबन की मशाल से , ह्रदय चीरते तम का
उच्छ्वास बने  पुण्य प्रकाश , हो ये द्रष्टान्त अपूर्व और  अनुपम सा

बनो मानवता के पथ प्रदर्शक , तिमिर चाहे कितना भी घनेरा हो
निज मन की दीप्ती से कह दो , ना चिराग तले कभी अँधेरा हो

हो कितना भी गहरा नैराश्य भाव  , जिजीविषा बिखर ना पाए
स्फुलिंग, इस विद्रूप जड़ता का , कही और प्रखर ना हो जाये

धरा का हर कण , प्रकाश पुंज , चिन्तनशील और देदीप्यमान हो
कर सके समूल नाश, तिमिर और तमस का, हम ऐसे प्रकाशवान हो

23 comments:

  1. हो कितना भी गहरा नैराश्य भाव , जिजीविषा बिखर ना पाए
    स्फुलिंग, इस विद्रूप जड़ता का , कही और प्रखर ना हो जाये

    मैं निशब्द हूँ ..बेहतरीन भाव सुन्दर शब्द विन्यास ..निश्चित ही हिंदी के शब्दों का बेहतरीन प्रयोग जानते हैं आप.

    ReplyDelete
  2. पिछली कविता में श्रृंगार रस के बाद ओज से भरी आपकी कविता। अद्भुत ! बहुत ही प्रेरक।

    ReplyDelete
  3. bahut hi achhi kavita hai aapki
    deepti sharma

    ReplyDelete
  4. धरा का हर कण , प्रकाश पुंज , चिन्तनशील और देदीप्यमान हो
    कर सके समूल नाश, तिमिर और तमस का, हम ऐसे प्रकाशवान हो

    बहुत सुन्दर ...मन में चेतना जगाती सुन्दर ...अति सुन्दर भावों से भरी रचना ..

    ReplyDelete
  5. बहुत अच्छे , क्या लिखा है लगता है कि ये कलम अब तक छुपी क्यों रही. उसे निर्बाध प्रवाहमान होने दो , जो रचेगी सन्देश ही होगा. इस चलते हुए जीवन के लिए,
    एक कोई अच्छा सा उपदेश ही होगा.

    ReplyDelete
  6. ब्लाग जगत की दुनिया में आपका स्वागत है। आप बहुत ही अच्छा लिख रहे है। इसी तरह लिखते रहिए और अपने ब्लॉग को आसमान की उचाईयों तक पहुंचाईये मेरी यही शुभकामनाएं है आपके साथ
    ‘‘ आदत यही बनानी है ज्यादा से ज्यादा(ब्लागों) लोगों तक ट्प्पिणीया अपनी पहुचानी है।’’
    हमारे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

    मालीगांव
    साया
    लक्ष्य

    हमारे नये एगरीकेटर में आप अपने ब्लाग् को नीचे के लिंको द्वारा जोड़ सकते है।
    अपने ब्लाग् पर लोगों लगाये यहां से
    अपने ब्लाग् को जोड़े यहां से

    ReplyDelete
  7. अति सुन्दर भावों से भरी रचना|

    ReplyDelete
  8. संगीता जी , शिखा जी, दिव्या जी , रेखा जी .दीप्ति जी ,सुरेन्द्र जी और patali -the village जी

    आप सबका बहुत आभार , मेरा हौसला आफजाई के लिए

    ReplyDelete
  9. धरा का हर कण , प्रकाश पुंज , चिन्तनशील और देदीप्यमान हो
    कर सके समूल नाश, तिमिर और तमस का, हम ऐसे प्रकाशवान हो

    wah ... bahut khoobsurat ashish ji... saath hi aapka shukriya jo aap mere blog par padhare ... aur apna samay diya

    ReplyDelete
  10. बहुत ही खूबसूरत भावोँ से सजी लाजबाव कविता। शानदार हैँ आपकी लेखनी। बहुत-बहुत बधाई! -: VISIT MY BLOG :- ऐ-चाँद बता तू , तेरा हाल क्या हैँ............कविता को पढ़कर अपने अमूल्य विचार व्यक्त करने के लिए आप सादर आमंत्रित हैँ। आप इस लिँक पर क्लिक कर सकते हैँ।

    ReplyDelete
  11. हो कितना भी गहरा नैराश्य भाव , जिजीविषा बिखर ना पाए
    स्फुलिंग, इस विद्रूप जड़ता का , कही और प्रखर ना हो जाये

    धरा का हर कण , प्रकाश पुंज , चिन्तनशील और देदीप्यमान हो
    कर सके समूल नाश, तिमिर और तमस का, हम ऐसे प्रकाशवान हो

    Bahut khoob kyaa baat hai Bhaai!. Pahli ball pr hi chhakka...Aise hi Shabon ke chaukon-chaakkon ki barsaat karte rahen hm bhingte rahen, Nahate rahen,.. aanandit hote rahen, ...........Badhai sarthak aur bhaawnayi lekhan ke liye.

    ReplyDelete
  12. @क्षितीजा जी

    आपका आभार उत्साहवर्धन के लिए.वैसे कानपुर में आपका स्वागत है .
    @अशोक जी
    बहुत बहुत धन्यवाद , पधारने के लिए
    @आशीष जी
    आशीष बना रहे .
    @ j .p तिवारी जी
    प्रसन्नता है की आपको मेरा तुच्छ प्रयास पसंद आया .

    ReplyDelete
  13. अच्छी अभिव्यक्ति ,शुभ कामनाएं । आप खबरों के लिए पढ़ सकते हैं " "खबरों की दुनियाँ"


    "

    ReplyDelete
  14. बनो मानवता के पथ प्रदर्शक , तिमिर चाहे कितना भी घनेरा हो
    निज मन की दीप्ती से कह दो , ना चिराग तले कभी अँधेरा हो
    Bahut sundar aura preranaadaayak vicharon vali post ke liye hardik shubhkamnayen.

    ReplyDelete
  15. Truelly beautiful.. i hope that following wud surely help me to improve my vocabulary.. thnk u ..

    ReplyDelete
  16. हमारे अन्दर का प्रकाश वाह्य जगत को भी अवलोकित करेगा, इसी आस में ढो रही है धरा हमको।

    ReplyDelete
  17. सुंदर शब्द योजना के साथ आशावादी स्वर में लिखी गई यह कविता बहुत अच्छी लगी।

    ReplyDelete
  18. धरा का हर कण , प्रकाश पुंज , चिन्तनशील और देदीप्यमान हो
    कर सके समूल नाश, तिमिर और तमस का, हम ऐसे प्रकाशवान हो
    bahut sunder bhav...
    badhai evam shubhkamnayen.

    ReplyDelete
  19. हो कितना भी गहरा नैराश्य भाव , जिजीविषा बिखर ना पाए
    स्फुलिंग, इस विद्रूप जड़ता का , कही और प्रखर ना हो जाये

    बहुत बढ़िया सर।

    सादर

    ReplyDelete
  20. हमारी जिजीविषा ही हमें धीरे-धीरे प्रकाश की ओर लिए चलती है . बहुत सुन्दर लिखा है आपने . साधुवाद ..

    ReplyDelete
  21. वाह! बहुत सुन्दर रचा है आपने...
    सादर...

    ReplyDelete