Thursday, November 14, 2013

विश्व वैचित्र्य

कही अतुल जलभृत वरुणालय
गर्जन करे महान
कही एक जल कण भी दुर्लभ
भूमि बालू की खान

उन्नत उपल समूह समावृत
शैल श्रेणी एकत्र
शिला सकल से शून्य धान्यमय
विस्तृत भू अन्यत्र

एक भाग को दिनकर किरणे
रखती उज्जवल उग्र
अपर भाग को मधुर सुधाकर
रखता शांत समग्र

निराधार नभ में अनगिनती
लटके लोक विशाल
निश्चित गति फिर भी है उनकी
क्रम से सीमित काल

कारण सबके पंचभूत ही
भिन्न कार्य का रूप
एक जाति में ही भिन्नाकृति
मिलता नहीं स्वरुप

लेकर एक तुच्छ कीट से
मदोन्मत्त मातंग
नियमित एक नियम से सारे
दिखता कही न भंग

कैसी चतुर कलम से निकला
यह क्रीडामय चित्र
विश्वनियन्ता ! अहो बुद्धि से
परे विश्व वैचित्र्य.

15 comments:

  1. bada hi sundar chitran .....nabh aur dhara ka....:)

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  2. कहीं प्रचुरता और कहीं अभाव ... फिर भी हर जगह जीवन है , सौंदर्य है ... और कविता है ... और कवि की नज़र से कुछ नहीं बचता .. बहुत सुन्दर लिखा ... :)....

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  3. लेकर एक तुच्छ कीट से
    मदोन्मत्त मातंग
    नियमित एक नियम से सारे
    दिखता कही न भंग
    ........आह अति सुन्दर ..छायावादी युग का भ्रमण कराती सुन्दर रचना !!

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  4. बहुत ही अच्छा लगा ... जी...

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  5. वाह.....
    कितना सुन्दर चित्रण.......लगता नहीं कोई आजकल के कवि को पढ़ रहे हैं.
    वेदों पुराणों सा लेखन है आपका...
    too good!!!
    अनु

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    1. उत्साहवर्धन के लिए आभार आपका .

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  6. इसको अच्छा कहते हैं :)
    आपके पास ज्ञान की कमी है .........\

    ये बेहद अच्छा है ॥ !!
    काश !!
    ऐसा ही अच्छा हम भी लिख पाते :)
    भैया जी :)

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  7. खूबसूरत प्रस्तुति

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  8. कहीं लेखनी सजा रही सुंदर सुंदर शब्द
    कहीं सोच सोच भी न निकले एक मनोरम वर्णः)

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  9. कैसी चतुर कलम से निकला
    यह क्रीडामय चित्र
    विश्वनियन्ता ! अहो बुद्धि से
    परे विश्व वैचित्र्य.
    अद्भुत चिंतन शैली -वाह !
    नई पोस्ट लोकतंत्र -स्तम्भ

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  10. kya kahen ... ham to nishabdh hain .

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  11. बहुत सही आशीष .....प्रकृति के नियम कभी नहीं बदलते...अगर बदल जाएं तो हाहाकार हो जाये .....क्यों नहीं मनुष्य उसका अनुसरण करता ...और हाँ बहोत सुन्दर लिखा है आपने .....:)

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  12. उत्कृष्ट रचना …सुन्दर तथा शुद्ध शब्दों में अपनी भावनाओं का चित्रण आपने बहुत ही अच्छे ढंग से किया है आपने… बधाई

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  13. गहराई लिए है आपका लेखन ..... अति सुंदर

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  14. विश्व मे रचा बसा वैचित्र कभी कभी आश्चर्यचकित कर देता है .....और आपकी इस सुंदर रचना के लिए जैसे शब्द कम पड़ रहे हैं .....!!!बहुत सुंदर रचना ...!!

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