Wednesday, March 14, 2012

अस्तित्व की खोज


कल गोधुलि में, किसी ने मेरे ,अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगाया
क्षण भर को वितृष्णा जाग उठी , अकिंचन मन भी अकुलाया

दुर्भेद्य अँधेरे में भी, मन दर्पण , प्रतिबिंबित करता मेरी छाया
लाख जतन कोटि परिश्रम , पर अस्तित्व बिम्ब नजर न आया

विस्फारित नेत्रों से नीलभ नभ में , ढूंढ़ता अपने स्फुटन को
मार्तंड की रश्मि से पूछा , टटोला फिर निशा के विघटन को

क्या उसके कलुषित ह्रदय  का , ये  भी कोई ताना बाना है?
या उसके  कुटिल व्यक्तित्व का ,  कोई पीत पक्ष  अनजाना है 

उठा तर्जनी किसी तरफ , चरित्र हनन, हो गया शोशा है
हम निज कुंठा जनित स्वरों से , अंतर्मन को दे रहे  धोखा है

हम खोज  रहे अस्तित्व अपना , जैसे कस्तूरी ढूंढे  मृग राज
बिखर नहीं सकता ,कालखंड में , जिसकी त्वरित गति है आज

40 comments:

  1. आपकी इस रचना पर पहली प्रतिक्रिया के रूप में यह

    कस्तूरी कुन्डल बसे, म्रग ढ़ूंढ़े बन माहिं ।
    ऐसे घट-घट राम है, दुनिया देखे नाहिं ॥

    फिर से आता हूं कुछ और सोचकर, एक बार और पढ़कर।

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  2. हम खोज रहे अस्तित्व अपना , जैसे कस्तूरी ढूंढे मृग राज
    बिखर नहीं सकता ,कालखंड में , जिसकी त्वरित गति है आज
    Wah! Kya likha hai!

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  3. अब आपकी रचना के स्तर की टिप्पणी देना तो हमारे बस में नहीं है...
    मगर सीधे सरल शब्दों में आपकी लेखनी को दाद अवश्य दे सकते है...

    बहुत सुन्दर रचना...

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    1. धन्यवाद अभिव्यक्ति जी
      आप स्वनाम- धन्य है . आपकी टिपण्णी उत्साह बढाती है .

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  4. इस बदलते समय में सभ्‍यता की ऊपरी चमक दमक के भीतर उजड़ती सभ्‍यता, सूखती और सिकुड़ती संस्‍कृति की इस त्रासद स्थिति में आलोचना करने वाले तो बहुत मिल जाते हैं, खुद की समीक्षा करने वाले कम। जब हम एक उंगली किसी को दिखाते हैं तो तीन उंगली अपनी ओर ही होती है। कविता में इसी संवेदना का विस्तार व्‍यापक रूप से देखा जा सकता है।

    शब्द सामर्थ्य, भाव-सम्प्रेषण, लयात्मकता की दृष्टि से कविता अत्युत्तम हैं।

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    1. आप विलक्षण दृष्टि वाले हो जो इतना सब देख लेते है साधारण सी कविता में . आभार

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  5. दूसरे पर तो उंगली सभी आसानी से उठा देते हैं .... लेकिन बिरले ही फिर आत्म - मंथन किया करते हैं ... गहन मंथन को कहती अच्छी रचना ...

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    1. मथन चल रहा है उम्मीद है अमृत की .

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  6. प्रश्न उठाना औरों की नियति है, हम अपने उत्तर पहले से ढूढ़े और सुलझाये बैठे हैं। Giving allowances for their doubting too.

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    1. सत्य वचन प्रवीण जी

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  7. क्या उसके कलुषित ह्रदय का , ये भी कोई ताना बाना है?
    या उसके कुटिल व्यक्तित्व का , कोई पीत पक्ष अनजाना है
    आज की भागती हुई जीवन शैली में मनुष्य अपने स्वाभाविक गुण "मानवता "से दूर हो गया है |संभवतः इसीलिए ह्रदय कलुष से भर गया है |ऐसे में ही हम अपना अस्तित्व बनाये रखें ....बहुत बड़ी बात है .....
    आपकी उत्कृष्ट लेखनी आज बहुत सोच का सामान दे रही है ...!!शब्द,भाव तथा विचार तीनो का संगम लिए उत्तम रचना ...!!

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    1. मानवता वाले गुण को संजो रखने की कोशिश जारी है .

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  8. उठा तर्जनी किसी तरफ , चरित्र हनन, हो गया शोशा है
    हम निज कुंठा जनित स्वरों से , अंतर्मन को दे रहे धोखा है

    अद्भुत पंक्तियाँ हैं.....

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  9. अद्भुत!!!
    वाह! इस अंतर्दृष्टि को नमन!

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    1. जिन ढूंढा तिन पाईयां

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  10. बड़ी ऊंची बात कह दी जी आपने तो !
    अस्तित्व खो गया तो उचित जगह एफ़ आई आर कराइये।
    बाकी मनोज कुमार जी ने कहा ही है उसई से काम चलाया जाये।

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    1. करा दिया है रिपोर्ट. थाने में कोई जान पहचान हो बताइयेगा

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  11. जब सारे विचार गिर जाते है तब भी कोई मुस्काते हुए हमें संभाले रहता है वही अस्तित्व है.ऊँगली उठाने वाले अपनी तरफ से तो गूढ़ संकेत ही देते हैं.. काव्य-शिल्प बांधे रखती है और प्रवाह बहा ले जाती है..

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    1. अमृत वचन , सत्य वचन .आभार

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  12. क्या उसके कलुषित ह्रदय का , ये भी कोई ताना बाना है?
    या उसके कुटिल व्यक्तित्व का , कोई पीत पक्ष अनजाना है ...

    चाहे कैसा भी पक्ष हो ... अस्तित्व को लीलना आसान नहीं होता ... वो तो मुखर रहता है प्रकाश की तरह ... सुन्दर रचना ... लाजवाब शिल्प ...

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    1. उत्साह बढ़ाने के लिए शुक्रिया

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  13. अच्छी है. बहुत अच्छी है. :)
    कम शब्दों को ज्यादा समझा जाए :)

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    1. आपने तो गागर में सागर भर दिया .

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  14. gazab ka likha hai aapne aapki to bhasha he man mohleti hai to rachna k fir kya kahne....:)...

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    1. सम्प्रेषण की अदना कोशिश की है मैंने . आभार .

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  15. उठा तर्जनी किसी तरफ , चरित्र हनन, हो गया शोशा है
    हम निज कुंठा जनित स्वरों से , अंतर्मन को दे रहे धोखा है
    हम्म विचारणीय ...पर सबसे आसान काम तो यही है न ..दूसरों की कमियां निकलना,उन पर उंगली उठाना.
    गज़ब का शब्द प्रवाह.

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    1. सत्य वचन . धन्यवाद

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  16. स्वाद सफलता का चखा उसीने
    जिसने किया स्वयं का मूल्यांकन
    जो करता रहा औरों का विश्लेषण
    उसने सदा खोया गौरव धन

    आपकी लेखनी में एक अलग सा जादू है ,बस पढ कर मन खुश हो जाता है ............. थोडा हमको भी सिखा दीजिये ना......

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    1. अपर्णा तेरे लिए पोस्ट -डोक्टोरेट के लिए ये विषय चुन लिया गया है . हा हा

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  17. उठा तर्जनी किसी तरफ , चरित्र हनन, हो गया शोशा है
    हम निज कुंठा जनित स्वरों से , अंतर्मन को दे रहे धोखा है!
    सुन्दर शब्दों का चयन कविता को जीवंत कर देता है , काश हम भी ऐसा कर पाते !

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    1. आपकी कवितायेँ प्रभावित करती है . स्पष्ट सम्प्रेषण भूमि पर . आभार .

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  18. आपकी ये रचना मुझे बरसो पहले लिखी कुछ पंक्तिया याद दिलाती है
    आये है जीने के लिये या मृत्यु के लिये जीते है
    कही मृत्यु तो वही नही हम जिसको जीवन कहते है.

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  19. गज़ब की शब्द सामर्थ्य है आपकी ...
    शुभकामनायें !

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  20. मन की उलझनों को बेहद प्रखर और स्पष्ट स्वर मिल गये .... बहुत बढिया !!!

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  21. दुर्भेद्य अँधेरे में भी, मन दर्पण , प्रतिबिंबित करता मेरी छाया
    लाख जतन कोटि परिश्रम , पर अस्तित्व बिम्ब नजर न आया

    अस्तित्व की तलाश करती बहुत अच्छी कविता।

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    1. अति सुन्दर, सादर.
      कृपया मेरे ब्लॉग" meri kavitayen" की नवीनतम प्रविष्टि पर भी पधारें.

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