Friday, May 13, 2011

सूजा चाँद

स्नेही स्वजनों
अतिशय कार्य व्यस्तता भविष्य में दिख रही है , और नितांत निजी कारणों से थोड़े दिनों का अपने शहर से अप्रवास के कारण ब्लॉग लिखने के कार्य से अवकाश  लेना पड रहा है . लेकिन हम पढने और  टिपियाते रहने का  लोभ शायद ही संवरण कर पाएंगे .  काशी प्रवास के इस अवकाश के दौरान अगर कोई ब्लोगर भाई मिल गया तो शिखर बैठक भी हो सकती है . क्या पता कोई वहा डूबा हुआ मनन कर रहा हो  अपनी कालजयी रचना के सन्दर्भ में .  नीचे लिखी पंक्तियाँ हल्के  अंदाज में लिखी गयी है , और अनुरोध है कि इनको  फुल्के में लिया जाए .




"उपमा कालिदासस्य "ऐसा पढ़ा था
जूठी कर डाली उपमाये कविगण ने
जनकसुता के सौन्दर्य वर्णन को
 नहीं बची उपमा , तुलसी ने कहा था. \


कभी  हम प्राची की  लालिमा से
नायिका के  कपोल   याद करते है
कभी  ट्यूलिप की  अधखुली पंखुड़ी में
अपने प्रीतम को अपलक  निहारते है


कभी महबूब ,हमे चाँद नजर आता है
चाँद से  प्यार, हद से बढ़ जाए तो
आसमान से उतर  घर की देहरी में
बिचारा  वो खूंटी पर भी टंग जाता है


बिम्ब में दिखता है कविता का घनत्व
बेरुखी  में भी हम  देख लेते है अपनत्व
बैठ कर हम  छिछली  नदी   तट पर
ढूँढ लेते है जलधि गर्भ से अनमोल  तत्व


कवि की कल्पना कई बार कमाल करती है
चाँद गर आये धरनी  के पास घूमकर
कहते है चाँद का मुँह  सूजा है
फिर भी चांदनी मस्त निर्झर सी झरती है


चाँद  तो बदरी में छुप जाता है
कवि जी उपमाये गढ़ते रहते है
अद्भुत बिम्बों और प्रतीकों में
जनता को उलझाये रहते है .

35 comments:

  1. बहुत सुन्दर कविता लिखी है । अच्छी लगी । शीघ्र अवकाश से वापस आयें । आपका अवकाश काल सुखमय हो ।

    ReplyDelete
  2. नितांत निजी कारणों से व्यस्त होने वाले हैं भविष्य में ... अच्छा है ...खाली दिमाग ही शैतान का घर होता है :):)

    कवियों / कवयत्रिओं की कल्पना पर अच्छा खासा कटाक्ष कर दिया है ..पर हम नहीं सुधरेंगे ... हमारे पास तो कल्पनाएँ ही हैं ...:):)

    अच्छी प्रस्तुति

    ReplyDelete
  3. अच्छा खड़ा किया आपने भी बखेड़ा है
    बच गए,
    वरना कहते ‘चांद का मुंह टेढ़ा है।’
    कालीदास से बात शुरु कर आप तन गए हैं
    कालजयी इस रचना से महाकवि बन गए हैं।
    रचना आपकी अथाह सागर है
    और मेरा छुद्र मन गागर है
    इसके सारे रत्न से भर लाया हूं
    कह नहीं सकता आज क्या खोया क्या पाया हूं?
    अवकाश से अच्छी रचनाओं से हो जाऊंगा वंचित
    टिप्पणियां मिलती रहेंगी, हुआ मन पढ़कर हर्षित!

    ReplyDelete
  4. अच्छी कविता लिखी है आपने।
    पढ़ते हुए होठों पर मुस्कान तैर गई।

    ReplyDelete
  5. एक बार पुनः चिर परिचित अंदाज़ ए बयां
    अच्छा हुआ ये नही लिखा कि राम राम या कुछ दिनों के लिए ब्लागिंग छोड़ रहा हूँ
    लिकिन ई बताव कि हमसे कहे के सुतिज़रलैंड जाय रहे मूल हिय तौ काशी प्रवास
    कौनो बात नहीं ई तो दुनिया के चलन है घर में आदमी लेता रहता है मूल मोबाईल पे कही कि अबे हम मीटिंग में है

    --

    ReplyDelete
  6. सुंदर पोस्ट बधाई और शुभकामनाएं |काशी में एक ब्लागर दैनिक जागरण में हैं श्यामल जी 9450955978 b h u me arvind mishra ji depott.science

    ReplyDelete
  7. क्या बात है ..आपने एक साथ कितनी बातों को कितनी खूबसूरती के साथ कह डाली..बहुत अच्छा लगा ..आनंद आया शुभकामना

    ReplyDelete
  8. बहुत धांसू जनता कविता लिख डाली। बहुत खूब टाइप।
    वैसे चांद के खिलाफ़ तमाम केस बनते हैं। यहां भी देखिये नाम आया है उसका:
    चांद की आवारगी है बढ़ रही प्रतिदिन
    किसी दिन पकड़ा गया तो क्या होगा?

    हर गोरी के मुखड़े पे तम्बू तान देता है
    कोई मजनू थपड़िया देगा तो क्या होगा?

    लहरों को उठाता है, वापस पटकता है
    सागर कहीं तऊआ गया तो क्या होगा?

    उधार की रोशनी पर चमकता, ऐठता है,
    सूरज समर्थन खैंच लेगा तो क्या होगा?

    अभी तक गोरे मुखड़ों पे विराजते रहे बबुआ
    ओबामा सावले चेहरे पे बईठा दिहिस तो क्या होगा?

    ReplyDelete
  9. तुमने चाँद की बखिया उधेड़ कर रख दी, और उसको क्या से क्या बना दिया? रही सही कसर अनूप जी ने पूरी कर दी. वैसे यह भी सही है -- चाँद दूर से ही सुहाना लगता है नहीं तो पास में जाकर लोग कहते हैं उसका मुखड़ा चकिया सा टंका दिखता है.

    ReplyDelete
  10. bhut hi gahre bhaavo ko apne shabdo me dhala hai... bhut khub...

    ReplyDelete
  11. बिम्बो, प्रतिबिम्बों में लहराता साहित्य।

    ReplyDelete
  12. :-)
    शुभकामनायें !

    ReplyDelete
  13. कवि की कल्पना कई बार कमाल करती है
    चाँद गर आये धरनी के पास घूमकर
    कहते है चाँद का मुँह सूजा है
    फिर भी चांदनी मस्त निर्झर सी झरती है
    यही तो कवि की कल्पना और हाथ का जादू है , सूखे में भी नदी बहती है

    ReplyDelete
  14. बिम्ब में दिखता है कविता का घनत्व
    बेरुखी में भी हम देख लेते है अपनत्व
    बैठ कर हम छिछली नदी तट पर
    ढूँढ लेते है जलधि गर्भ से अनमोल तत्व

    बहुत सुंदर काव्य रचना .....

    ReplyDelete
  15. हमारा चंदा मामा, हमारी कल्पना चाहें खूँटी पर लटकाएं या घर में बैठाएं किसी को क्या परेशानी है जी :).
    अच्छी क्लास ले डाली है कवि और उसकी काल्पनिक उपमाओं की.
    आप काशी जा रहे हैं तो एक चाँद वहाँ से ले आइये :)
    शुभकामनायें ......

    ReplyDelete
  16. हा हा सही है शिखा जी , भाई चाँद तो अपना ही है तभी तो हम उसको जैसे चाहे घूमा फिरा लेते है . बाकी काशी में तो चाँद धारी रहते है माने चन्द्र धारण किये शिव .

    ReplyDelete
  17. बिम्ब में दिखता है कविता का घनत्व
    बेरुखी में भी हम देख लेते है अपनत्व
    बैठ कर हम छिछली नदी तट पर
    ढूँढ लेते है जलधि गर्भ से अनमोल तत्व
    maja aa gaya padhkar aur anup ji ne to dho hi di pahle hi daag liye phirta hai us par roshni par bhi swaal khada kar diya

    उधार की रोशनी पर चमकता, ऐठता है,
    सूरज समर्थन खैंच लेगा तो क्या होगा?
    kal tak khoobsurati ke charche rahe ab khatre me pad raha hai bechara
    dono hi laazwaab

    ReplyDelete
  18. बहुत सटीक और सुन्दर प्रस्तुति...

    ReplyDelete
  19. कभी महबूब ,हमे चाँद नजर आता है
    चाँद से प्यार, हद से बढ़ जाए तो
    आसमान से उतर घर की देहरी में
    बिचारा वो खूंटी पर भी टंग जाता है ...
    महबूब और खूँटि पर ... नही नही ... जब वो चारदीवारी में आता है तो दूसरे को खूँटि में टाँग देता है ...
    बहुत अच्छी रचना है ...

    ReplyDelete
  20. aap ki kavita ka chand mera mama hai esliye main kuchh nahi kahugi

    ReplyDelete
  21. क्या आप हमारीवाणी के सदस्य हैं? हमारीवाणी भारतीय ब्लॉग्स का संकलक है.


    अधिक जानकारी के लिए पढ़ें:
    हमारीवाणी पर ब्लॉग पंजीकृत करने की विधि

    हमारीवाणी पर ब्लॉग प्रकाशित करने के लिए क्लिक कोड लगाएँ

    ReplyDelete
  22. बहुत ही अच्‍छा लिखा है ...बेहद सार्थक प्रस्‍तुति ।

    ReplyDelete
  23. वाह...क्या बात है...

    ReplyDelete
  24. काशी प्रवाश!
    कहां ठहरे हैं कुछ बतायेंगे ? मेल-वेल करेंगे ? ब्लॉगर को कैसे ढूढेंगे!
    चांद-वांद का ही चक्कर है क्या ? आपके फाइल में तो मेल का पता है ही नहीं।

    ReplyDelete
  25. भावोद्गार को उपमाये तो चिर काल तक गढ़ी जाती रहेंगी...

    ReplyDelete
  26. इनके बिना काव्य संभव कहाँ है...

    ReplyDelete
  27. चाँद तो बदरी में छुप जाता है
    कवि जी उपमाये गढ़ते रहते है
    अद्भुत बिम्बों और प्रतीकों में
    जनता को उलझाये रहते है .
    कवियों पर आक्षेप अच्छी बात नहीं है | सुंदर अभिव्यक्ति बधाई तो ले ही लीजिये ....

    ReplyDelete
  28. aashash ji
    bahut hi sundar aur prvaah mayi post .ab main yah to nahi likhungi ki aapne chand ki bakhiya ukhed di hai .par upmaao v prativimbo ka aapne behad hi shandaar tareeke se upyog kiya hai .bahut hi achhi nahi bahut bahut hi achhi lagi aapki rachna .jald hi wapas aaiyega .
    intjaar rahega---
    dhanyvaad sahit
    poonam

    ReplyDelete
  29. चाँद तो बदरी में छुप जाता है
    कवि जी उपमाये गढ़ते रहते है
    अद्भुत बिम्बों और प्रतीकों में
    जनता को उलझाये रहते है .

    क्या बात है.खूब कहा आपने.

    ReplyDelete
  30. सही है.. गलत नहीं कहा है.. जहाँ न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि!!
    कवि की उड़ान कहीं की कहीं हो सकती है.. कोई बंदिश नहीं...

    सुख-दुःख के साथी पर आपके विचारों का इंतज़ार है..
    आभार

    ReplyDelete
  31. आपकी वापसी की प्रतीक्षा है...

    ReplyDelete
  32. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी (कोई पुरानी या नयी ) प्रस्तुति मंगलवार 14 - 06 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    साप्ताहिक काव्य मंच- ५० ..चर्चामंच

    ReplyDelete
  33. उपमाओं में कवि स्वयम ही उलझा रहता है तब तो अद्भुत उपमाओं का अधिकारी भी होता है .

    ReplyDelete