Thursday, January 6, 2011

कल जीवन से फिर मिला

कल वो सामने बैठी थी
कुछ संकोच ओढे  हुए
सजीव प्रतिमा, झुकी आंखे
पलकें अंजन रेखा से मिलती  थी



मेरे मन के निस्सीम गगन में
निर्जनता घर कर आयी थी
आकुल मन अब  विचलित है
मुरली बजने लगी जैसे निर्जन में


 
खुले चक्षु से यौवनमद का रस बरसे
अपलक मै निहार रहा श्रीमुख को
सद्य स्नाता चंचला जैसे
निकल आयी हो चन्द्र किरण  से



उसने जो दृष्टी उठाई तनिक सी
मिले नयन उर्ध्वाधर से
अधखुले अधरों में स्पंदन
छिड़ती मधुप तान खनक सी
 


ना जाने ले क्या अभिलाष
मेरे जीवन की नवल डाल
बौराए नव  तरुण रसाल
नव जीवन की फिर दिखी आस



सुखद भविष्य के सपनो में
निशा की घन पलकों में झांक रहा
बिभावरी बीती, छलक  रही उषा
जगी लालसा ह्रदय के हर कोने में .




















41 comments:

  1. खूबसूरत अहसास .
    नव जीवन में आशा का संचार करती पंक्तियाँ .
    सुन्दर कविता है .
    नए साल में नव जीवन की समस्त शुभकामनाये..

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  2. साहित्य की सुन्दरता और सुन्दरता का साहित्य।

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  3. bahut hi sunder rachna
    nav varsh ki hardik badhayi

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  4. इस बेहतरीन कविता ने सुन्दरता को साक्षात उपस्थित कर दिया है हर पंक्ति में।
    आभार।

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  5. ना जाने ले क्या अभिलाष
    मेरे जीवन की नवल डाल
    बौराए नव तरुण रसाल
    नव जीवन की फिर दिखी आस
    ऐसे ही जीवन क़ा उल्लास बना रहे

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  6. खुले चक्षु से यौवनमद का रस बरसे
    अपलक मै निहार रहा श्रीमुख को
    सद्य स्नाता चंचला जैसे
    निकल आयी हो चन्द्र किरण से
    bahut hi khoobsurat ehsaas

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  7. खूबसूरत शब्‍द रचना ...।

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  8. itni sundar rachna ..ek engineer ke dwara...agar aapko bhi RANCHO mil gaya hota to shayad aap full time kavi hote..:)

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  9. सुंदर अहसास की जीवंत अभिव्यक्ति। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
    फ़ुरसत में आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री के साथ

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  10. aashish ji
    ati sundar rachna, bahut hi khubsurati ke saath gudh shabdo ka chayan rachna me char chand laga raha hai. har ek panktiya badi gahrai se likhi hai aapne.
    hardik badhai
    poonam

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  11. बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों....बेहतरीन भाव....खूबसूरत कविता...

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  12. खुले चक्षु से यौवनमद का रस बरसे
    अपलक मै निहार रहा श्रीमुख को
    सद्य स्नाता चंचला जैसे
    निकल आयी हो चन्द्र किरण से

    kitna pyar baras raha in shabdo me....
    follow karne se rok nahi paya...
    ab barabar aaunga...:)

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  13. यह कविता बहुत ही प्यारी लगी।
    शब्द और भाव, दोनों ही अति सुंदर।

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  14. बहुत खूब ...
    हार्दिक शुभकामनायें !

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  15. अलंकरणों से सजी लावण्यमयी कविता

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  16. बहुत खूब. बेहतरीन शब्दों और भावों से सजाया है कविता को.

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  17. सुखद भविष्य के सपनो में
    निशा की घन पलकों में झांक रहा
    बिभावरी बीती, छलक रही उषा
    जगी लालसा ह्रदय के हर कोने में .


    कविता यूं लगी मनो एक मुलाक़ात जिंदगी के साथ. ....!

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  18. नए साल में नव जीवन की समस्त शुभकामनाये

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  19. खूबसूरत पलों को शब्दों में बंधने का प्रयास ...एक बहुत सुन्दर एहसास से लिखी रचना ..मन को सुकून देती हुई ...विगत की जिंदगी को साहसपूर्ण आगे बढाने का और सुखमय बनाने का स्वप्न ...शुभकामनाएं ...

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  20. नव जीवन में नवल आस नव वर्ष में हो साक्षात्.

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  21. बहुत अच्छी प्रस्तुति....बधाई!
    कभी समय मिले तो हमारे ब्लॉग//shiva12877.blogspot.com पर भी अपनी एक नज़र डालें .

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  22. आशीष जी,
    सुन्दर शब्द-चित्र, अच्छा लिखते हैं आप !
    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

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  23. आशीष भाई, आज दोबारा कविता पढी, मजा आ गया। एक बार फिर से बधाई स्‍वीकारें।

    ---------
    बोलने वाले पत्‍थर।
    सांपों को दुध पिलाना पुण्‍य का काम है?

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  24. बहुत अच्छी प्रस्तुति....बधाई!

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  25. प्रेममयी.. सुंदर आशावादी अहसास..... बेहतरीन

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  26. आपकी कविता रचनात्मकता का अदभुत नमूना है ..बहुत सुंदर

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  27. खुले चक्षु से यौवनमद का रस बरसे
    अपलक मै निहार रहा श्रीमुख को
    सद्य स्नाता चंचला जैसे
    निकल आयी हो चन्द्र किरण से ...

    कविता पढ़ कर आनंद आ गया ...आशीष जी .. सरिता बहा दी है आपने सदभावों की ... सुंदर शब्दसंरचना ...

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  28. वाह आशीष जी वाह,
    सौन्दर्यबोध कराती खूबसूरत रचना.

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  29. कल वो सामने बैठी थी
    कुछ संकोच ओढे हुए
    सजीव प्रतिमा, झुकी आंखे
    पलकें अंजन रेखा से मिलती थी


    आशीष जी पलकें क्या यहाँ तो पूरी तस्वीर ही रेखा से मिलती है .....

    अरे... उमराव जान वाली ......

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  30. कोमल भावुक मोहक प्रेमोद्गार...

    बहुत सुन्दर रचना...

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  31. बसंत का शंखनाद हो गया समझो !

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  32. देरी से आने के लिए क्षमाप्रार्थी हूं.खूबसूरत अहसासों को समेटती एक भावपूर्ण प्रस्तुति. आभार.
    आप को वसंत पंचमी की ढेरों शुभकामनाएं!
    सादर,
    डोरोथी.

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  33. सौम्य शिष्ट श्रृंगार की मिसाल है यह रचना...

    बहुत बहुत सुन्दर...

    भाव और अभिव्यक्ति दोनों ही manmohak...

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  34. क्या बात है भाई!
    पलकें अंजन रेखा से मिलती थी
    टाइम वसूल लाइन!

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  35. बहुत खूबसूरत रचना

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  36. बहुत खूबसूरत रचना

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