Monday, November 18, 2013

तत्व

तरल तरंगो सी क्षण क्षण नव
केलि कामनाएं करती

थिरक थिरक मेरे मानस में

अतुलित आन्दोलन भरती




वीचि वृन्द के चंचल उर में

उत्कंठा ने ले अवतार
चित्र विचित्र खीच दिखलाया
मणि मंडित आभरण अपार





उनसे उदगत दीप्त दीप्ति से

सज्जित सुन्दर उनके अंग
उस कल्पित आकर्षक छवि पर
मन में ऐसी उठी उमंग 





लड़ी जगत चिंता की टूटी 

कर देता सब कुछ निस्सार

उन्हें मिली वो मणियाँ सुन्दर

इसी अर्थ सारे व्यापार




नित नवीन श्रम जनित खेद से

खिन्न हुआ मै अति ही श्रांत

मुकुलित चर्म-चक्षु , उन्मीलित
मानस के लोचन अभ्रांत 





उनसे बाह्य जगत की मणियाँ

लज्जित थी पा गहरी हार

वो फूली नहीं समाई मन में
मिला देख सच्चा भंडार 





हंस कर मैंने निज जड़ता पर

हर्षित होकर खोई भ्रान्ति

सुलझ गई जीवन की उलझन
मेरी मिटी अपरिमित श्रांति .

Thursday, November 14, 2013

विश्व वैचित्र्य

कही अतुल जलभृत वरुणालय
गर्जन करे महान
कही एक जल कण भी दुर्लभ
भूमि बालू की खान

उन्नत उपल समूह समावृत
शैल श्रेणी एकत्र
शिला सकल से शून्य धान्यमय
विस्तृत भू अन्यत्र

एक भाग को दिनकर किरणे
रखती उज्जवल उग्र
अपर भाग को मधुर सुधाकर
रखता शांत समग्र

निराधार नभ में अनगिनती
लटके लोक विशाल
निश्चित गति फिर भी है उनकी
क्रम से सीमित काल

कारण सबके पंचभूत ही
भिन्न कार्य का रूप
एक जाति में ही भिन्नाकृति
मिलता नहीं स्वरुप

लेकर एक तुच्छ कीट से
मदोन्मत्त मातंग
नियमित एक नियम से सारे
दिखता कही न भंग

कैसी चतुर कलम से निकला
यह क्रीडामय चित्र
विश्वनियन्ता ! अहो बुद्धि से
परे विश्व वैचित्र्य.

Monday, November 11, 2013

स्वागत




ज्योतिहीन जीवन मग में 
कंटक कुल संकुल मग में 
भटक भटक पद छिन्न हुए 
मुझ से मेरे भिन्न हुए.


चुन तो लीं कलियाँ सुकुमार 
गुंथा हिममय सौरभ सार
अलियों कि गुन गुन गुंजार 
थी स्वागत गायन झंकार .


स्वर्ण घटित उन घड़ियों में 
रत्नो की फूलझड़ियों में 
तुम आयी जब मेरे द्वार 
मै दौड़ा लाने उपहार .


भूला ! मै तुम मेरी निधि हो 
फिर तव स्वागत किस विधि हो ?
करमाला या हो मनुहार 
करलो इनको ही स्वीकार .

Wednesday, November 6, 2013

क्या लिखुँ

क्या लिखूं ? जो गूढ़ हो .
ज्ञान पर आरूढ़ हो .
पुष्टि मांगती है मेधा
सिद्ध हो या मूढ़ हो .


क्या लिखूं ? जो छंद हो
सद चित हो, आनंद हो
मन पे ऐसा हो असर
ज्यों जीभ पर मकरंद हो ,


क्या लिखूं ? जो राग हो .
विराग हो ,अनुराग हो
कौन्तेय जैसा धर्मधारी
 कृष्ण सा बीतराग हो .


क्या लिखूं ? जो स्वस्ति हो .
हो भक्ति या , विरक्ति हो
प्रदक्षिणा हो ज्ञान की
नैराश्य , न आसक्ति हो .

.
 वह लिखूं जो सुविचार हो
सगुण और निर्विकार हो 
द्वेष दम्भ अतिरंजित न हो 
 हो  न्यून पर ओंकार हो .

Thursday, October 3, 2013

क्यों


छल छल करती सरिता में क्यों 
छलका करुण प्रवाह? 
निर्झर क्यों झर झर बिखराता
नयन नीर का वाह ?




लतिका के नत आनन पर क्यों ? 
झलका अन्तर्दाह ?
तरु क्यूँ पत्र -अधर -कम्पन से 
भरते नीरव आह ?




सांध्य गगन की मलिनाकृति से 
क्यों प्रकटित अवसाद ?
श्यामल भूधर झींगुर रव मिष
क्यों करते दुःख नाद ?

Monday, September 16, 2013

आकुल अंतर के तीन वर्ष

फिर विश्वकर्मा पूजा के लिए निर्धारित दिन आ पहुंचा , कहने को तो श्री विश्वकर्मा को देवलोक का एकमात्र अभियंता का पद प्राप्त है लेकिन तीन साल पहले उनकी पूजा अर्चना के बाद ( व्यावसायिक कर्म में शामिल है ) इस ब्लॉग को बनाने की प्रेरणा मिली . शुरुवाती हिचकिचाहट और सीमित ज्ञान का डर , कुछ मित्रों के मार्गदर्शन और सतत उत्साहवर्धन से वाष्पित हो गया और और फिर कालांतर में संघनित होकर बूँद बूँद बरसने लगा निज मन सुख खातिर।
 कुछ शब्दों को जोड़कर लिखने की कला में (तुकबंदी भी कह सकते है ) कुछ पंक्तियाँ जोड़ जाड के लिखकर ऐसी अद्भुत अनुभूति होती थी जैसे ब्रम्हा को सृष्टि की सबसे अद्भुत कृति बनाकर होती होगी . कविता कर्म का ककहरा भी नहीं जानता था (वैसे अभी भी नहीं जानता हूँ ) नाही कविता के व्याकरण से भिज्ञ था . बहुत सारे विद्वान मित्रो को पढना , उनको रचना धर्मिता से कुछ सिखने की कोशिश करना मुझे सबसे प्रिय कार्य लगता है. ,
 ब्लॉग लेखन साहित्य का अंग है या नही ये मेरे सोचने का विषय नही (अपने आप को सुयोग्य नही पाता हूँ ) मै अपने बहुत सारे साथी ब्लोगरों को पढने की भरसक कोशिश करता हूँ . विभिन्न विधाओ के सुरुचिपूर्ण आलेख और कविताओं का रसपान का मौका यहाँ सुगमता पूर्वक उपलब्ध है . कुछ नाम भी लेने का मन है जिनको मै पढ़ पाता हूँ ( काश सारे ब्लॉग पढ़ पाता ) . प्रवीण पाण्डेय जी की लेखनी से निकले ललित निबन्ध मुझे बहुत आकर्षित करते है और शायद पूरे ब्लॉग जगत को भी . फुरसतिया महाराज श्रीयुत अनूप शुक्ल जी का व्यंग लेखन गुदगुदाता है . शिखा वार्ष्णेय जी की घुमक्कड़ी गाथा और संस्मरण कथा बांध के रखती है तथा सुश्री अमृता तन्मय , अनुपमा पाठक , अंजना दी , की कवितायेँ रस सिक्त कर जाती है .अनुपमा दी (त्रिपाठी ) और संगीता दी (स्वरुप) को पढना आह्लादित करता है . विभिन्न विधाओं में पारंगत और बहुत सारे मित्र ब्लोग्गर है जिनको पढने की युगत में रहता हूँ .
 इस अद्भुत विधा से मुझे कुछ मिला हो या नही , मैंने मानवी भावनाओ के अधीन प्रेम सिक्त कुछ आदरणीय और प्रिय रिश्तो को भी जिया है, कई बार कठिन परिस्थितियों में मित्रो का संबल महसूस किया . मुझे अपनी कविता ( अकविता भी हो सकती है ) को आप सभी गुनीजनो के सामने प्रस्तुत कर जो हर्षानुभूति होती है और आपकी शब्द टिपण्णी से जो उर्जा मिलती है वो किसी मसिजीवी के लिए वरदान से कम नही है...
 मेरा ब्लॉग लिखने कि आवृति कछुए कि चाल जैसी है और कई बार जामवंत कि जरुरत महसूस होती है (अब ये मत कहियेगा कि मै अपने आप को हनुमान बोल रहा हूँ ). कई बार मित्रों ने याद दिलाया है कि महीनो से मैंने कुछ पोस्ट नही किया और मै उनको बहादुर मानव / मानवी मानता हूँ कि मुझे झेलने के लिए (आ बैल मुझे मार टाइप भी सुनने को मिला है :)) कटिबद्ध है 
मै अपने प्रिय मित्रो को आश्वस्त करना चाहूँगा की उन्हें ,मेरी उटपटांग शब्द रचना को झेलने से छुटकारा नही मिलने वाला है . और अभी डटे रहने का इरादा है . भले ही आवृति कम हो . अंत में बस इतना कहकर समाप्त करना चाहूँगा कि ब्लॉग्गिंग नही होती तो मेरे जैसा अल्पज्ञानी अपनी भावनाओं को शायद शब्द नही दे पाता .सभी मित्रो का धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ और आभार प्रकट करता हूँ . .

Thursday, September 5, 2013

बधशाला -14

कान लगाकर ! क्या सुनता है ,बोतल की कुल कुल आला
मधुबाला को लिए बगल में , क्या बैठा है मतवाला
बेटे का कर्तव्य यही क्या , दुनिया मुंह पर थुकेगी
मस्त पड़ा तू मधुशाला में , देख रही मां बधशाला.


सोम सुधा को सुरा बताये , पड़ा अक्ल पर क्या ताला
द्रोण कलश को मधुघट कहता ,हुआ नशे में मतवाला
सुरा पान का कहाँ समर्थन , वेदों को बदनाम न कर
अरे असुर क्यों खोल रहा है , दिव्य ज्ञान की बधशाला 


बने रहेंगे मंदिर जिनमे , नित्य जरी जाये माला
बनी रहेगी मस्जिद जिसमे , सदा आये अल्ला -ताला
है भारत आज़ाद ! देखले , आँख खोलके ओ काफ़िर
सभी जगह खुल रही ! खुलेगी , मधुशाला की बधशाला